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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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आनंद कुमारस्वामी: लोक परंपरा और उसका वि-औपनिवेशीकरण

Author(s) Shubhendu
Country India
Abstract राजा राव ने अपने कालजयी उपन्यास ‘द सरपेंट एंड द रोप’ में लिखा है, “यह बोस्टन ब्राह्मण, आनंद कुमारस्वामी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के किसी भी लड़खड़ाते हुए पुराने अध्यक्ष की तुलना में कहीं अधिक स्मार्त, एक सच्चे और रूढ़िवादी भारतीय थे। भारत का निर्माण हमारे राजनेताओं और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसरों द्वारा नहीं, बल्कि भारत के इन एकाकी अस्तित्वों द्वारा किया जाएगा, जिनमें भारत का स्मरण, अनुभव और संचार किया जाता है; इतिहास से परे, परंपरा के रूप में, सत्य के रूप में; यह बहुत कम मायने रखता है। लेकिन कुमारस्वामी के इस भारत को भला कौन छीन पाएगा? न तैमूर और न ही जोसेफ स्टालिन।” [2, 1] यह उद्धरण कुमारस्वामी की उस विराट बौद्धिक सत्ता को रेखांकित करता है जिसने बीसवीं शताब्दी में भारतीय तत्वमीमांसा और कला इतिहास की दिशा बदल दी। [1] आनंद केंटिश मुथु कुमारस्वामी का जन्म 22 अगस्त 1877 को कोलंबो, ब्रिटिश सीलोन में एक प्रतिष्ठित संकर परिवेश में हुआ था। [1, 2, 3] उनके पिता सर मुथु कुमारस्वामी एक तमिल विधायक और दार्शनिक थे, जो पोंनमबलम-कुमारस्वामी परिवार के स्तंभ थे, जबकि उनकी माता एलिजाबेथ बीबी एक अंग्रेज महिला थीं। [1, 3] पितृ-छाया से मात्र दो वर्ष की आयु में वंचित होने के कारण उनका पालन-पोषण और प्रारंभिक शिक्षा इंग्लैंड में हुई, जहाँ उन्होंने ग्लौसेस्टरशायर के स्ट्राउड स्थित वायक्लिफ कॉलेज में अध्ययन किया। [1, 2] उनकी प्रारंभिक शैक्षणिक प्रतिभा विज्ञान की ओर उन्मुख थी, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) से भूविज्ञान और वनस्पति विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। [1] 1902 से 1906 के मध्य सीलोन के खनिज विज्ञान पर उनके गहन शोध ने उन्हें ‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ (D.Sc.) की उपाधि से विभूषित किया और ‘जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ सीलोन’ की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके वे प्रथम निदेशक नियुक्त हुए। [1, 2]
Published In Volume 7, Issue 9, September 2026
Published On 2026-09-11
DOI https://doi.org/10.70528/IJLRP.v7.i9.2402

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