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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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समान नागरिक संहिता के अंतर्गत महिलाओं के सामाजिक और विधिक अधिकारों का उपचार और औचित्य

Author(s) रवि वास्कले
Country India
Abstract भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक एवं बहुजातीय राष्ट्र है । भारतीय समाज में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण तथा परिवार से संबंधित अनेक विषय लंबे समय से विभिन्न धार्मिक व्यक्तिगत विधियों द्वारा विनियमित होते रहे हैं । इन व्यक्तिगत विधियों की विविधता ने जहाँ भारतीय समाज की सांस्कृतिक बहुलता को संरक्षित किया है, वहीं कुछ परिस्थितियों में महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के प्रश्न भी उत्पन्न किए हैं । इसी संदर्भ में भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है । समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य केवल विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों को एक कानून में बदलना नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच समानता, न्याय, गरिमा और विधिक संरक्षण की स्थापना करना है । विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में इसका महत्व अधिक है, क्योंकि विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति सीधे प्रभावित होती है । सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों ने भी व्यक्तिगत विधियों में लैंगिक न्याय की आवश्यकता पर बल दिया है । शायरा बानो बनाम भारत संघ में तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया गया, जबकि विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा में पुत्री को पैतृक सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार की व्याख्या की गई ।
वर्तमान समय में समान नागरिक संहिता का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक उदाहरण उत्तराखंड है । उत्तराखंड ने 2024 में समान नागरिक संहिता अधिनियम पारित किया और इसे 27 जनवरी 2025 से लागू किया गया । इसके अंतर्गत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार तथा लिव-इन संबंधों जैसे नागरिक विषयों के लिए समान व्यवस्था विकसित की गई । उत्तराखंड के आधिकारिक पोर्टल पर 2025 के नियमों के साथ बाद के संशोधनों एवं 2026 के संशोधन अधिनियम का भी उल्लेख है । यह शोध-पत्र महिलाओं के सामाजिक एवं विधिक अधिकारों के संदर्भ में समान नागरिक संहिता के औचित्य, संभावनाओं, चुनौतियों और सीमाओं का विश्लेषण करता है । अध्ययन का निष्कर्ष है कि समान नागरिक संहिता तभी वास्तव में महिला सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती है, जब उसमें समानता के साथ-साथ गरिमा, निजता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक विविधता तथा कमजोर वर्गों के संरक्षण का संतुलन स्थापित किया जाए ।
Keywords समान नागरिक संहिता, महिला अधिकार, लैंगिक समानता, व्यक्तिगत विधि, सामाजिक न्याय, उत्तराधिकार, विवाह, तलाक, भरण-पोषण, संविधान, विधिक अधिकार ।
Field Arts
Published In Volume 7, Issue 8, August 2026
Published On 2026-08-20

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