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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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ग्रामीण क्षेत्रो में भू जल स्तर की गिरावट - एक भोगोलिक अध्ययन

Author(s) मनमोहन मीना
Country India
Abstract भू-जल ग्रामीण भारत की जीवन रेखा है, जो पेयजल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा दोनों का आधार स्तंभ है। प्रस्तुत शोध पत्र ग्रामीण अंचलों में तेजी से गिरते भू-जल स्तर (Water Table) की भौगोलिक समीक्षा करता है। इस अध्ययन का उद्देश्य उन प्राकृतिक और मानवीय कारकों का विश्लेषण करना है जो जलभृतों (Aquifers) के रिक्त होने का कारण बन रहे हैं। जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक और पारिस्थितिक धरोहर' है। मानव सभ्यता का इतिहास जल स्रोतों के किनारे ही लिखा गया है। 21वीं सदी में, जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या विस्फोट के बीच, जल की उपलब्धता एक वैश्विक चुनौती बनकर उभरी है। भारत के संदर्भ में, यह चुनौती और भी विकट है क्योंकि यहाँ विश्व की 18% जनसंख्या निवास करती है, जबकि ताजे जल के संसाधन मात्र 4% हैं। यह शोध मिश्रित पद्धति का उपयोग करते हुए यह निष्कर्ष निकालता है कि वर्षा की अनिश्चितता की तुलना में 'मानवीय हस्तक्षेप' और 'अवैज्ञानिक कृषि पद्धतियां' भू-जल संकट के लिए अधिक उत्तरदायी हैं। अंत में, यह पत्र जल संसाधन प्रबंधन के लिए स्थानिक और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है।
मुख्य शब्द (Keywords): भू-जल स्तर,अतिदोहन,जल विज्ञान,डार्क जोन,वर्षा जल संचयन
प्रस्तावना :
जल पृथ्वी पर जीवन का आधारभूत तत्व है। भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ की लगभग 70% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि, मुख्य रूप से भू-जल (Groundwater) संसाधनों पर निर्भर है। पिछले कुछ दशकों में, जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण और 'हरित क्रांति' के पश्चात गहन कृषि (Intensive Agriculture) के कारण भू-जल पर दबाव अत्यधिक बढ़ गया है।
भूगोल की दृष्टि से, भू-जल स्तर का गिरना केवल जल की कमी नहीं है, बल्कि यह उस क्षेत्र के पारितंत्र (Ecosystem) में आए असंतुलन का सूचक है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं और तालाबों का सूखना तथा नलकूपों (Tube-wells) का गहरा होते जाना अब एक सामान्य घटना बन चुकी है, जो एक गंभीर भौगोलिक और पर्यावरणीय चिंता का विषय है। ग्रामीण परिदृश्य में, जहाँ जीवन की धुरी कृषि और पशुपालन है, वहां जल का महत्व और भी बढ़ जाता है। पिछले तीन दशकों में, सतही जल (नदी, तालाब) की कमी और प्रदूषण के कारण, निर्भरता पूरी तरह से भू-गर्भिक जल पर शिफ्ट हो गई है। यह शोध पत्र इस ज्वलंत मुद्दे को भौगोलिक दृष्टिकोण से समझने का एक प्रयास है, ताकि हम जान सकें कि हमारी धरती की प्यास बुझाने वाला जल स्रोत स्वयं क्यों प्यासा होता जा रहा है।

शोध के उद्देश्य :
इस भौगोलिक शोध पत्र के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. ग्रामीण क्षेत्र में पिछले 10-20 वर्षों में भू-जल स्तर में आए उतार-चढ़ाव का विश्लेषण करना।
2. भू-जल स्तर में गिरावट के लिए उत्तरदायी प्राकृतिक (Natural) और मानवीय (Anthropogenic) कारकों की पहचान करना।
3. गिरते जल स्तर का स्थानीय कृषि प्रारूप (Cropping Pattern) और सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन करना।
4. जल संरक्षण के लिए भौगोलिक और व्यावहारिक उपाय सुझाना।

शोध प्रविधि (Research Methodology)
प्रस्तुत अध्ययन में मिश्रित विधि (Mixed Method) का प्रयोग किया गया है, जिसमें प्राथमिक और द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ों का समावेश है:
• प्राथमिक स्रोत (Primary Sources):
o क्षेत्रीय सर्वेक्षण (Field Survey) और अवलोकन।
o किसानों और ग्रामीणों से प्रश्नावली (Questionnaire) के माध्यम से साक्षात्कार।
o चयनित कुओं की गहराई का प्रत्यक्ष मापन।
• द्वितीयक स्रोत (Secondary Sources):
o केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) और राज्य भू-जल विभाग की रिपोर्ट।
o जिला सांख्यिकी पुस्तिका और मौसम विभाग के वर्षा सम्बन्धी आंकड़े।
ग्रामीण क्षेत्रों में भू-जल स्तर की गिरावट को समझने के लिए हमें इसके ऐतिहासिक और वर्तमान परिप्रेक्ष्य को विस्तार से देखना होगा:
• हरित क्रांति का प्रभाव: 1960-70 के दशक में आई हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो बनाया, लेकिन इसकी भारी कीमत भू-जल को चुकानी पड़ी। नहरों की पहुंच सीमित होने के कारण, लाखों नलकूप (Tube wells) खोदे गए।
• जल निकासी बनाम पुनर्भरण (Discharge vs. Recharge): भू-जल एक नवीकरणीय संसाधन है, बशर्ते निकासी की दर पुनर्भरण की दर से कम हो। वर्तमान में, ग्रामीण क्षेत्रों में हम 'भू-जल का उपयोग' नहीं कर रहे, बल्कि 'भू-जल का खनन' (Mining of Water) कर रहे हैं। हम उस पानी को निकाल रहे हैं जिसे जमा होने में हजारों वर्ष लगे थे।
• अदृश्य संकट: नदियों का सूखना दिखाई देता है, लेकिन भू-जल का गिरना एक 'अदृश्य संकट' है। जब तक कुएं पूरी तरह सूख नहीं जाते, तब तक इसकी गंभीरता का अहसास नहीं होता।
• भौगोलिक विविधता: भारत के अलग-अलग हिस्सों में भू-जल की स्थिति अलग है। गंगा के मैदानी इलाकों में जल स्तर नीचे जा रहा है लेकिन वहां 'रिचार्ज' की संभावना अधिक है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत (पठारी भाग) में कठोर चट्टानें होने के कारण एक बार पानी खत्म होने पर उसे दोबारा भरने में बहुत समय लगता है।
विश्लेषण: भू-जल गिरावट के कारण (Analysis: Causes of Depletion)
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भू-जल स्तर में गिरावट के लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:
अ. प्राकृतिक कारक (Geographical/Natural Factors):
1. वर्षा की अनिश्चितता: भारतीय मानसून की अनियमित प्रकृति के कारण कई वर्षों तक सूखा पड़ना, जिससे प्राकृतिक पुनर्भरण (Natural Recharge) बाधित होता है।
2. चट्टानी संरचना: यदि क्षेत्र में कठोर चट्टानें (जैसे ग्रेनाइट या बेसाल्ट) हैं, तो जल का रिसाव (Infiltration) धीमा होता है और जलभृत (Aquifers) जल्दी नहीं भर पाते।


ब. मानवीय कारक (Anthropogenic Factors):
1. नलकूपों का अतिदोहन: विद्युत चालित सबमर्सिबल पंपों के अत्यधिक उपयोग से जल निकासी की दर, जल पुनर्भरण की दर से कई गुना अधिक हो गई है।
2. फसल चक्र में परिवर्तन: परम्परागत कम पानी वाली फसलों (जैसे- ज्वार, बाजरा) के स्थान पर अधिक पानी वाली फसलों (जैसे- धान, गन्ना, गेहूं) की खेती।
3. जल निकायों का अतिक्रमण: ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों और जोहड़ों पर अतिक्रमण होने से वर्षा जल संचयन के प्राकृतिक स्रोत नष्ट हो गए हैं।
4. वन विनाश: वनस्पति आवरण कम होने से वर्षा जल बहकर निकल जाता है (Run-off) और जमीन में नहीं रिस पाता।
गिरते जल स्तर के प्रभाव (Impacts)
1. कृषि लागत में वृद्धि: जल स्तर नीचे जाने से किसानों को बार-बार बोरवेल गहरे कराने पड़ते हैं, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है।
2. पेयजल संकट: गर्मी के मौसम में हैंडपंप और कुएं सूख जाते हैं, जिससे महिलाओं को दूर से पानी लाना पड़ता है।
3. जल गुणवत्ता में ह्रास: गहरे जल स्तर से पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक और लवणता (Salinity) की मात्रा बढ़ रही है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
4. मृदा नमी में कमी: ऊपरी सतह की नमी कम होने से प्राकृतिक वनस्पति सूखने लगती है।
प्रभाव एवं परिणाम (Impacts and Consequences)
1. कृषि का 'दुष्चक्र': जल स्तर गिरने से किसानों को हर 2-3 साल में बोरवेल गहरा करवाना पड़ता है। इससे कर्ज बढ़ता है और कृषि लाभ का सौदा नहीं रहती।
2. फ्लोराइड और आर्सेनिक संक्रमण: भू-गर्भ में अधिक गहराई पर स्थित चट्टानों में हानिकारक खनिज होते हैं। जब जल स्तर बहुत नीचे चला जाता है, तो पानी में फ्लोराइड घुलने लगता है, जिससे ग्रामीणों में हड्डियों और दांतों की बीमारियां (फ्लोरोसिस) हो रही हैं।
3. ऊर्जा संकट: पानी जितना गहरा होगा, उसे खींचने के लिए उतनी ही अधिक बिजली की आवश्यकता होगी।
4. सामाजिक तनाव: जल बंटवारे को लेकर पड़ोसियों और गाँवों के बीच झगड़े बढ़ रहे हैं।

.तालिका : 1 राजस्थान में भू-जल दोहन की स्थिति (ब्लॉक-वार वर्गीकरण)
श्रेणी (Category) ब्लॉकों की संख्या (2011) ब्लॉकों की संख्या (2022-23) स्थिति में परिवर्तन
सुरक्षित (Safe) 25 38 मामूली सुधार (नहर क्षेत्रों के कारण)
अर्ध-संवेदनशील (Semi-Critical) 20 22 स्थिरता
संवेदनशील (Critical) 24 20 गिरावट
अति-दोहित (Over-Exploited) 172 219 अत्यधिक चिंताजनक वृद्धि
लवणीय (Saline) 3 3 स्थिर
कुल ब्लॉक 243 295 (पुनर्गठन के बाद) -
स्रोत: Dynamic Ground Water Resources of India, CGWB Reports (2011 & 2023).
विश्लेषण: उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में 'अति-दोहित' (Over-exploited) ब्लॉकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। वर्तमान में राज्य के 74% से अधिक ब्लॉक 'डार्क जोन' में हैं, जिसका अर्थ है कि वहां पुनर्भरण (Recharge) की तुलना में निकासी (Extraction) अधिक है।




तालिका 2: राजस्थान के प्रमुख जिलों में भू-जल स्तर की गहराई (तुलनात्मक अध्ययन)

जिला (District) औसत जल स्तर (mbgl) - 2013 औसत जल स्तर (mbgl) - 2023 गिरावट (मीटर में) क्षेत्र की प्रकृति
जयपुर 30.45 48.6 -18.15 अर्ध-शुष्क/शहरी दबाव
जोधपुर 45.1 62.3 -17.2 मरुस्थलीय
नागौर 38.2 54.5 -16.3 फ्लोराइड प्रभावित
अलवर 18.5 32.1 -13.6 औद्योगिक क्षेत्र
गंगानगर 12.1 10.5 +1.60 (सुधार) नहरी क्षेत्र (IGNP)
टिप्पणी: mbgl = Meters Below Ground Level (भूमि सतह से नीचे मीटर में) स्रोत: भू-जल विभाग, राजस्थान सरकार वार्षिक रिपोर्ट।
विश्लेषण: तालिका 2 दर्शाती है कि जहाँ इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) वाले गंगानगर जैसे जिलों में जल स्तर में मामूली सुधार हुआ है, वहीं जयपुर, जोधपुर और नागौर जैसे गैर-नहरी क्षेत्रों में भू-जल स्तर 13 से 18 मीटर तक नीचे चला गया है, जो एक भयावह स्थिति है।






तालिका 3: भू-जल दोहन का स्तर
क्षेत्र/जिला भू-जल दोहन का प्रतिशत (%) श्रणी
सम्पूर्ण भारत (औसत) 60.08% सुरक्षित
सम्पूर्ण राजस्थान (औसत) 151.07% अति-दोहित
जयपुर (ग्रामीण) 184.40% अत्यंत गंभीर
जैसलमेर 138.20% अति-दोहित
झुंझुनू 176.80% अति-दोहित
डूंगरपुर 68.50% सुरक्षित (पहाड़ी क्षेत्र)

स्रोत: Central Ground Water Board (CGWB) Assessment 2023.
विश्लेषण: राजस्थान का औसत दोहन 151% है, जिसका अर्थ है कि हम प्रतिवर्ष प्रकृति द्वारा दिए गए पानी का डेढ़ गुना निकाल रहे हैं। यह अतिरिक्त 51% "जीवाश्म जल" (Fossil Water) है जो हजारों वर्षों में जमा हुआ था और अब समाप्त हो रहा है।

सुझाव एवं समाधान (Suggestions and Solutions)
भौगोलिक अध्ययन के आधार पर जल संरक्षण हेतु निम्न उपाय आवश्यक हैं:
1. वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting): घरों की छतों और खेतों में टांका, कुंड या सोख्ता गड्ढों का निर्माण अनिवार्य किया जाए।
2. सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली: फ्लड इरिगेशन (Flood Irrigation) के स्थान पर 'ड्रिप' और 'स्प्रिंकलर' सिंचाई को बढ़ावा देना।
3. फसल विविधीकरण: क्षेत्र की जलवायु और जल उपलब्धता के अनुसार ही फसलों का चयन करना।
4. कृत्रिम पुनर्भरण: पुराने कुओं और नलकूपों के माध्यम से वर्षा जल को सीधे भू-गर्भ में उतारना।
5. एकीकृत जल संभरण प्रबंधन ढलान के अनुरूप मेड़बंदी और चेक-डैम बनाकर वर्षा जल को रोकना। "खेत का पानी खेत में, गाँव का पानी गाँव में" के सिद्धांत को अपनाना।

निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भू-जल स्तर की तीव्र गिरावट एक आसन्न 'जल आपातकाल' का संकेत है। यह समस्या केवल प्रकृति जनित नहीं है, बल्कि अनियोजित मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है। यदि समय रहते 'रिचार्ज' और 'डिस्चार्ज' के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो ग्रामीण क्षेत्र मरुस्थलीकरण की ओर बढ़ सकते हैं। अतः जल साक्षरता, सामुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक प्रबंधन को अपनाना समय की मांग है। इस भौगोलिक अध्ययन से यह स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भू-जल स्तर की गिरावट एक गंभीर 'मानव-जनित आपदा' है। यदि वर्तमान दोहन दर जारी रही, तो अगले दो दशकों में कई ग्रामीण क्षेत्र मरुस्थल में परिवर्तित हो सकते हैं। समस्या का समाधान केवल इंजीनियरिंग में नहीं, बल्कि 'जल चेतना' में है। हमें भू-जल को 'निजी संपत्ति' के बजाय 'सामुदायिक संसाधन' (Community Resource) मानना होगा। सतत विकास (Sustainable Development) के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी आवश्यकताओं और प्रकृति की पुनर्भरण क्षमता के बीच संतुलन स्थापित करें।

संदर्भ सूची (References)
1. सिंह, सविन्द्र (2020). पर्यावरण भूगोल. प्रयागराज: प्रवालिका पब्लिकेशन्स.
2. गुप्ता, एस.के. (2018). भारत का जल संसाधन. नई दिल्ली: नेशनल बुक ट्रस्ट.
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6. शाह, टी. (2009). Taming the Anarchy: Groundwater Governance in South Asia. Resources for the Future Press.
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8. योजना (मासिक पत्रिका), जल संरक्षण विशेषांक, जून 2022.
Keywords .
Field Arts
Published In Volume 5, Issue 12, December 2024
Published On 2024-12-17

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