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E-ISSN: 2582-8010
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Volume 7 Issue 1
January 2026
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राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति का सवाई माधोपुर जिले के संदर्भ में अवलोकन
| Author(s) | तेजराम मीना, डॉ. रीमा सिंह |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | सहकारी बैंकिंग प्रणाली भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक सशक्त आधार स्तंभ रही है। राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्य में केंद्रीय सहकारी बैंकों की भूमिका किसानों, लघु उद्यमियों, पशुपालकों तथा ग्रामीण समाज के कमजोर वर्गों को संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। प्रस्तुत शोध-पत्र में राजस्थान में कार्यरत केंद्रीय सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति का सवाई माधोपुर जिले के विशेष संदर्भ में अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन का उद्देश्य वित्तीय प्रदर्शन, ऋण वितरण, ऋण वसूली, एनपीए की स्थिति, लाभप्रदता तथा संरचनात्मक चुनौतियों का विश्लेषण करना है। अध्ययन में यह पाया गया कि सवाई माधोपुर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक ने कृषि एवं ग्रामीण ऋण वितरण में सकारात्मक भूमिका निभाई है, किंतु ऋण वसूली, तकनीकी आधुनिकीकरण तथा प्रबंधन दक्षता के क्षेत्र में अभी भी सुधार की आवश्यकता है। शोध से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि पारदर्शी प्रबंधन, डिजिटल बैंकिंग और पेशेवर नेतृत्व को बढ़ावा दिया जाए तो सहकारी बैंक ग्रामीण वित्तीय सशक्तिकरण का सुदृढ़ माध्यम बन सकते हैं। मुख्य शब्द (Key Words): केंद्रीय सहकारी बैंक, वित्तीय स्थिति, ऋण वसूली, एनपीए, सवाई माधोपुर, ग्रामीण बैंकिंग 1. प्रस्तावना (Introduction) भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सहकारी बैंकिंग का एक विशिष्ट और ऐतिहासिक स्थान रहा है। सहकारी बैंकों की अवधारणा भारत में ग्रामीण और कृषि प्रधान समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित की गई थी। औपनिवेशिक काल में ग्रामीण क्षेत्रों में साहूकारों और महाजनों द्वारा किसानों एवं कमजोर वर्गों का अत्यधिक शोषण किया जाता था, जिससे वे ऋण-जाल में फँसकर आर्थिक रूप से और अधिक कमजोर हो जाते थे। इसी पृष्ठभूमि में सहकारी बैंकिंग की स्थापना का मूल उद्देश्य ग्रामीण जनता को संस्थागत, सुलभ और सस्ती ऋण सुविधा प्रदान करना तथा उन्हें साहूकारी शोषण से मुक्त करना रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार ने सहकारी बैंकिंग को ग्रामीण आर्थिक विकास की रीढ़ के रूप में स्वीकार किया। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि, पशुपालन, ग्रामीण उद्योगों और स्वरोजगार को बढ़ावा देने में सहकारी बैंकों की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया। सहकारी बैंक न केवल ऋण प्रदान करने वाले संस्थान हैं, बल्कि वे ग्रामीण समाज में बचत की आदत को बढ़ावा देने, वित्तीय समावेशन को सुदृढ़ करने और आर्थिक लोकतंत्र की अवधारणा को साकार करने का माध्यम भी बने हैं। राजस्थान राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, वनोपज और लघु एवं कुटीर उद्योगों पर आधारित है। राज्य का एक बड़ा भू-भाग शुष्क एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्र में स्थित है, जहाँ कृषि वर्षा पर अत्यधिक निर्भर करती है। ऐसी परिस्थितियों में किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए ऋण की आवश्यकता निरंतर बनी रहती है। राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंक ग्रामीण ऋण वितरण प्रणाली का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जो प्राथमिक कृषि साख समितियों के माध्यम से किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण उपभोक्ताओं तक वित्तीय संसाधन पहुँचाते हैं। सवाई माधोपुर जिला भौगोलिक एवं आर्थिक दृष्टि से राजस्थान के उन जिलों में शामिल है, जहाँ प्राकृतिक संसाधनों की सीमितता और वर्षा की अनिश्चितता के कारण कृषि उत्पादन जोखिमपूर्ण बना रहता है। यहाँ की अधिकांश आबादी कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है, परंतु मानसून की अनियमितता, सिंचाई सुविधाओं की कमी और सीमित औद्योगिक गतिविधियों के कारण किसानों की आय स्थिर नहीं रह पाती। इस अस्थिरता का प्रत्यक्ष प्रभाव ऋण की मांग, ऋण वितरण की प्रकृति और ऋण वसूली की प्रक्रिया पर पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में सवाई माधोपुर जिले का केंद्रीय सहकारी बैंक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संतुलन प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण संस्थान बन जाता है। यह बैंक किसानों को फसली ऋण, अल्पकालीन एवं मध्यमकालीन ऋण, पशुपालन ऋण, उपभोक्ता ऋण तथा स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। इसके साथ ही बैंक सरकारी योजनाओं—जैसे फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड, सब्सिडी आधारित ऋण योजनाओं—के क्रियान्वयन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालाँकि, बदलते आर्थिक परिवेश, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, वाणिज्यिक बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की सक्रियता, तकनीकी परिवर्तन तथा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की समस्या ने सहकारी बैंकों के समक्ष नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं। कई सहकारी बैंक सीमित पूँजी, कमजोर प्रबंधन, ऋण वसूली में कठिनाई और प्रशासनिक हस्तक्षेप जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति, कार्यक्षमता और ग्रामीण विकास में उनके वास्तविक योगदान का वैज्ञानिक एवं तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए। इसी संदर्भ में प्रस्तुत शोध-पत्र में सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की वित्तीय स्थिति का गहन अध्ययन किया गया है। इसमें बैंक की पूँजी संरचना, जमा एवं ऋण की स्थिति, लाभ–हानि, ऋण वितरण की प्रवृत्ति, वसूली क्षमता तथा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही यह समझने का प्रयास किया गया है कि बैंक किस सीमा तक किसानों, ग्रामीण उद्यमियों और कमजोर वर्गों की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है तथा ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन और वित्तीय समावेशन में उसकी भूमिका कितनी प्रभावी रही है। यह अध्ययन न केवल सहकारी बैंकिंग की वर्तमान स्थिति को उजागर करता है, बल्कि उन क्षेत्रों की भी पहचान करता है जहाँ सुधार, संरचनात्मक परिवर्तन और नीति-स्तरीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इस प्रकार यह शोध-पत्र सहकारी बैंकिंग प्रणाली को अधिक सक्षम, पारदर्शी और ग्रामीण विकासोन्मुख बनाने की दिशा में एक सार्थक अकादमिक प्रयास है। 2. अध्ययन के उद्देश्य (Objectives of the Study) प्रस्तुत अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं— • राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंकों की वित्तीय स्थिति का अवलोकन करना। • सवाई माधोपुर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक के ऋण वितरण एवं वसूली की स्थिति का अध्ययन करना। • बैंक की लाभप्रदता, एनपीए एवं वित्तीय स्थिरता का विश्लेषण करना। • सहकारी बैंकिंग प्रणाली की प्रमुख समस्याओं और चुनौतियों की पहचान करना। • वित्तीय सुधार हेतु सुझाव प्रस्तुत करना। 3. शोध पद्धति (Research Methodology) प्रस्तुत अध्ययन की प्रकृति वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक है, जिसका उद्देश्य सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की वित्तीय स्थिति, कार्य-प्रणाली तथा ग्रामीण विकास में उसकी भूमिका का गहन एवं तथ्यपरक विश्लेषण करना है। इस अध्ययन में सहकारी बैंकिंग की संरचना, ऋण वितरण की प्रवृत्तियाँ, वित्तीय प्रदर्शन तथा समयानुसार हुए परिवर्तनों को समझने का प्रयास किया गया है। शोध पद्धति का चयन इस प्रकार किया गया है कि अध्ययन के उद्देश्यों की पूर्ति वैज्ञानिक, वस्तुनिष्ठ और तार्किक ढंग से की जा सके। अध्ययन क्षेत्र के रूप में राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले का चयन किया गया है। यह जिला भौगोलिक दृष्टि से अर्ध-शुष्क क्षेत्र में स्थित है, जहाँ कृषि और पशुपालन आजीविका के प्रमुख साधन हैं। वर्षा की अनिश्चितता, सीमित सिंचाई सुविधाएँ और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की निर्भरता के कारण यहाँ सहकारी बैंकिंग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सवाई माधोपुर जिले का केंद्रीय सहकारी बैंक किसानों, ग्रामीण कारीगरों, स्वयं सहायता समूहों और कमजोर वर्गों को वित्तीय सहायता प्रदान करने वाला प्रमुख संस्थान है, इसलिए इस जिले का चयन अध्ययन के लिए उपयुक्त और प्रासंगिक माना गया है। इस शोध में मुख्य रूप से द्वितीयक डेटा का उपयोग किया गया है। द्वितीयक डेटा के अंतर्गत केंद्रीय सहकारी बैंक, सवाई माधोपुर की वार्षिक रिपोर्टें, ऑडिट रिपोर्टें, बैलेंस शीट, लाभ-हानि खाते तथा अन्य वित्तीय विवरणों को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त, NABARD, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) तथा राजस्थान राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों, सांख्यिकीय पत्रिकाओं और बैंकिंग से संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों का भी उपयोग किया गया है। इन स्रोतों से प्राप्त आंकड़े अध्ययन को विश्वसनीयता और प्रामाणिकता प्रदान करते हैं। डेटा के विश्लेषण के लिए उपयुक्त सांख्यिकीय एवं विश्लेषणात्मक तकनीकों का प्रयोग किया गया है। प्रतिशत विश्लेषण की सहायता से बैंक की वित्तीय स्थिति, जैसे जमा, ऋण, लाभ, हानि तथा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया गया है। वर्षवार तुलनात्मक विश्लेषण के माध्यम से विभिन्न वर्षों में बैंक के प्रदर्शन में आए परिवर्तनों का अध्ययन किया गया है, जिससे बैंक की प्रगति अथवा गिरावट की दिशा को समझा जा सके। इसके साथ ही विवरणात्मक व्याख्या द्वारा आंकड़ों की व्याख्या सरल और सार्थक रूप में प्रस्तुत की गई है, ताकि सहकारी बैंक की वास्तविक स्थिति और ग्रामीण विकास में उसकी भूमिका को स्पष्ट रूप से समझा जा सके। अध्ययन की अवधि सीमित वर्षों तक रखी गई है, जिससे उपलब्ध आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया जा सके। शोध में प्रयुक्त आंकड़ों की सीमाओं और विश्वसनीयता का भी ध्यान रखा गया है तथा निष्कर्षों को केवल उपलब्ध डेटा के दायरे में ही व्याख्यायित किया गया है। इस शोध पद्धति के माध्यम से यह प्रयास किया गया है कि सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की वित्तीय स्थिति का एक समग्र, वस्तुनिष्ठ और विश्लेषणात्मक चित्र प्रस्तुत किया जा सके। इस प्रकार अपनाई गई शोध पद्धति अध्ययन के उद्देश्यों की पूर्ति करने में सहायक है तथा सहकारी बैंकिंग प्रणाली को सुदृढ़ बनाने और ग्रामीण विकास को गति देने के लिए उपयोगी निष्कर्ष प्रदान करती है। 4. राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंकों का संक्षिप्त परिचय राजस्थान में सहकारी बैंकिंग प्रणाली ग्रामीण वित्तीय संरचना की रीढ़ मानी जाती है। राज्य की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ—जैसे व्यापक ग्रामीण क्षेत्र, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, वर्षा की अनिश्चितता और लघु एवं सीमांत किसानों की अधिक संख्या—सहकारी बैंकिंग की आवश्यकता और प्रासंगिकता को और अधिक बढ़ा देती हैं। इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान में सहकारी बैंकिंग व्यवस्था को त्रिस्तरीय ढांचे के अंतर्गत विकसित किया गया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों तक संस्थागत ऋण व्यवस्था की पहुँच सुनिश्चित की जा सके। इस त्रिस्तरीय सहकारी बैंकिंग संरचना का प्रथम स्तर प्राथमिक कृषि साख समितियाँ (Primary Agricultural Credit Societies – PACS) हैं, जो ग्राम स्तर पर कार्य करती हैं। PACS ग्रामीण सहकारी बैंकिंग की आधारशिला हैं और किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करती हैं। ये समितियाँ किसानों को अल्पकालीन एवं मध्यकालीन ऋण, कृषि आदानों की आपूर्ति, फसल ऋण तथा आकस्मिक आवश्यकताओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं। ग्रामीण जनता के लिए PACS सबसे सुलभ और परिचित संस्थान हैं। इस संरचना का दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण स्तर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (District Central Cooperative Bank – DCCB) का होता है, जो जिला स्तर पर कार्य करता है। केंद्रीय सहकारी बैंक PACS और राज्य सहकारी बैंक के बीच सेतु की भूमिका निभाते हैं। ये बैंक प्राथमिक कृषि साख समितियों को पुनर्वित्त (Refinance) उपलब्ध कराते हैं, जिससे समितियाँ किसानों को ऋण प्रदान कर सकें। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय सहकारी बैंक प्रत्यक्ष रूप से भी किसानों, स्वयं सहायता समूहों, ग्रामीण उपभोक्ताओं, कारीगरों और छोटे उद्यमियों को ऋण सुविधा प्रदान करते हैं। जमा संग्रह, ऋण वितरण, कृषि एवं ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में इन बैंकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। त्रिस्तरीय संरचना का शीर्ष स्तर राजस्थान राज्य सहकारी बैंक (Apex Bank) है, जो राज्य स्तर पर कार्य करता है। यह बैंक जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों को पुनर्वित्त, तकनीकी मार्गदर्शन और नीति संबंधी दिशा-निर्देश प्रदान करता है। राज्य सहकारी बैंक NABARD और अन्य वित्तीय संस्थाओं से संसाधन प्राप्त कर उन्हें जिला स्तर तक प्रवाहित करता है, जिससे संपूर्ण सहकारी बैंकिंग प्रणाली सुचारु रूप से संचालित हो सके। राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंक न केवल वित्तीय संस्थान हैं, बल्कि ग्रामीण विकास के सक्रिय सहभागी भी हैं। ये बैंक कृषि उत्पादन, पशुपालन, ग्रामीण रोजगार, स्वयं सहायता समूहों के सशक्तिकरण और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विशेष रूप से सूखा प्रभावित और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में केंद्रीय सहकारी बैंकों की भूमिका किसानों को आर्थिक संबल प्रदान करने में निर्णायक रही है। इस प्रकार राजस्थान की सहकारी बैंकिंग संरचना में केंद्रीय सहकारी बैंकों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये बैंक ग्रामीण वित्तीय प्रणाली की कड़ी के रूप में कार्य करते हुए न केवल ऋण उपलब्ध कराते हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और समावेशी विकास को प्रोत्साहित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। 5. सवाई माधोपुर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक की वित्तीय स्थिति सवाई माधोपुर जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि, पशुपालन और इससे जुड़े सहायक व्यवसायों पर आधारित है। इस संदर्भ में केंद्रीय सहकारी बैंक की वित्तीय स्थिति का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यही बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थागत ऋण का प्रमुख स्रोत है। बैंक की वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन ऋण वितरण, ऋण वसूली, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) तथा लाभप्रदता जैसे प्रमुख संकेतकों के आधार पर किया गया है। 5.1 ऋण वितरण की स्थिति: सवाई माधोपुर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक द्वारा विभिन्न प्रकार के ऋण उपलब्ध कराए जाते हैं, जिनमें कृषि ऋण, पशुपालन ऋण, लघु एवं कुटीर उद्योग ऋण तथा उपभोक्ता ऋण प्रमुख हैं। कृषि ऋण का उद्देश्य किसानों को बीज, उर्वरक, सिंचाई, कृषि उपकरण एवं फसल उत्पादन से जुड़ी आवश्यकताओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है। पशुपालन ऋण के माध्यम से दुग्ध उत्पादन, पशु क्रय तथा पशु चिकित्सा सेवाओं को बढ़ावा दिया गया है, जिससे किसानों की आय में विविधता आई है। पिछले कुछ वर्षों में बैंक के कुल ऋण वितरण में निरंतर वृद्धि देखी गई है, विशेष रूप से कृषि एवं पशुपालन ऋण के क्षेत्र में। यह वृद्धि ग्रामीण उत्पादन गतिविधियों के विस्तार और किसानों की संस्थागत ऋण पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाती है। लघु उद्यम ऋण ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को प्रोत्साहन दिया है, जबकि उपभोक्ता ऋण से ग्रामीण परिवारों की आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति हुई है। इस प्रकार, ऋण वितरण की बढ़ती प्रवृत्ति ने जिले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की है। 5.2 ऋण वसूली की स्थिति: ऋण वसूली की स्थिति किसी भी बैंक की वित्तीय स्थिरता का महत्वपूर्ण संकेतक होती है। सवाई माधोपुर जिले में केंद्रीय सहकारी बैंक की ऋण वसूली दर में पिछले वर्षों के दौरान क्रमिक सुधार देखा गया है। बैंक द्वारा समय-समय पर वसूली अभियान, जागरूकता कार्यक्रम और पुनर्भुगतान को प्रोत्साहित करने वाले उपाय अपनाए गए हैं, जिनसे वसूली में सुधार हुआ है। हालाँकि, जिले की कृषि वर्षा पर अत्यधिक निर्भर होने के कारण मानसून की असफलता, सूखा, अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं का ऋण वसूली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। किसानों की आय में अस्थिरता के कारण कुछ वर्षों में वसूली दर अपेक्षाकृत कम रही है। इसके बावजूद, हाल के वर्षों में बैंक द्वारा अपनाई गई सुदृढ़ वसूली रणनीतियों के कारण स्थिति में धीरे-धीरे सुधार देखा जा रहा है। 5.3 गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (Non-Performing Assets – NPA): केंद्रीय सहकारी बैंक के समक्ष बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ एक प्रमुख वित्तीय चुनौती के रूप में उभरकर सामने आई हैं। NPA का बढ़ना बैंक की वित्तीय सेहत और कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। सवाई माधोपुर जिले में NPA के बढ़ने के प्रमुख कारणों में प्राकृतिक आपदाएँ, किसानों की आय अस्थिरता, राजनीतिक हस्तक्षेप तथा समय-समय पर घोषित ऋण माफी योजनाएँ शामिल हैं। हाल के वर्षों में बैंक द्वारा NPA नियंत्रण हेतु कई प्रयास किए गए हैं, जैसे ऋण की बेहतर निगरानी, वसूली प्रक्रिया को सुदृढ़ करना तथा पात्रता के आधार पर ऋण स्वीकृति। इसके बावजूद, सामाजिक और राजनीतिक दबावों के कारण NPA स्तर को पूरी तरह नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। यह स्थिति बैंक की लाभप्रदता और दीर्घकालिक स्थिरता पर भी प्रभाव डालती है। 5.4 लाभप्रदता की स्थिति: सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की लाभप्रदता अपेक्षाकृत सीमित रही है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सहकारी बैंक व्यावसायिक लाभ की बजाय सेवा भावना और सामाजिक दायित्वों के आधार पर कार्य करते हैं। किसानों और कमजोर वर्गों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराना, ब्याज सब्सिडी योजनाओं का क्रियान्वयन तथा सामाजिक दायित्वों का निर्वहन बैंक की आय को सीमित कर देता है। इसके अतिरिक्त, बढ़ते प्रशासनिक व्यय, सीमित संसाधन और बढ़ते NPA भी बैंक की लाभप्रदता को प्रभावित करते हैं। फिर भी, सीमित लाभ के बावजूद केंद्रीय सहकारी बैंक ग्रामीण विकास, वित्तीय समावेशन और आर्थिक सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बैंक का उद्देश्य केवल लाभ अर्जन नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करना है। 6. प्रमुख समस्याएँ और चुनौतियाँ सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक ग्रामीण वित्तीय प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद अनेक संरचनात्मक, वित्तीय और प्रबंधकीय समस्याओं से जूझ रहा है। ये चुनौतियाँ न केवल बैंक की कार्यक्षमता और वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करती हैं, बल्कि ग्रामीण विकास में उसके योगदान को भी सीमित करती हैं। अध्ययन के दौरान निम्नलिखित प्रमुख समस्याएँ और चुनौतियाँ उभरकर सामने आई हैं: 6.1 ऋण वसूली में कठिनाई और एनपीए की समस्या” केंद्रीय सहकारी बैंक के समक्ष सबसे गंभीर समस्या ऋण वसूली में कठिनाई और बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ (NPA) हैं। सवाई माधोपुर जिला कृषि-प्रधान और वर्षा-आश्रित क्षेत्र होने के कारण किसानों की आय अस्थिर रहती है। सूखा, अतिवृष्टि और फसल क्षति जैसी परिस्थितियाँ ऋण चुकाने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। इसके अतिरिक्त, समय-समय पर घोषित ऋण माफी योजनाएँ और राजनीतिक आश्वासन भी ऋण अनुशासन को कमजोर करते हैं, जिससे जानबूझकर ऋण न चुकाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। परिणामस्वरूप बैंक की वित्तीय स्थिति और लाभप्रदता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 6.2 सीमित पूंजी आधार: केंद्रीय सहकारी बैंक की एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती उसका सीमित पूंजी आधार है। अपर्याप्त पूंजी के कारण बैंक की ऋण विस्तार क्षमता सीमित हो जाती है और वह ग्रामीण क्षेत्रों की बढ़ती ऋण आवश्यकताओं को पूर्ण रूप से पूरा नहीं कर पाता। सीमित पूंजी के चलते बैंक आधुनिक तकनीक अपनाने, शाखाओं के विस्तार और मानव संसाधन विकास में अपेक्षित निवेश नहीं कर पाता, जिससे उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होती है। 6.3 तकनीकी आधुनिकीकरण की कमी: वर्तमान बैंकिंग परिदृश्य में तकनीकी आधुनिकीकरण अत्यंत आवश्यक हो गया है। सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक में अभी भी कई प्रक्रियाएँ पारंपरिक और मैनुअल प्रणाली पर आधारित हैं। कोर बैंकिंग समाधान (CBS), डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन ऋण प्रबंधन और ग्राहक सेवा से जुड़ी तकनीकों का सीमित उपयोग बैंक की कार्यक्षमता और पारदर्शिता को प्रभावित करता है। तकनीकी पिछड़ेपन के कारण बैंक ग्राहकों को आधुनिक बैंकिंग सुविधाएँ उपलब्ध कराने में पीछे रह जाता है। 6.4 कर्मचारियों के प्रशिक्षण का अभाव: कर्मचारियों का समुचित प्रशिक्षण बैंक की सफलता के लिए अनिवार्य होता है। अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि केंद्रीय सहकारी बैंक के कर्मचारियों को नवीन बैंकिंग तकनीकों, वित्तीय प्रबंधन, जोखिम मूल्यांकन और ग्राहक सेवा के क्षेत्र में पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिल पा रहा है। प्रशिक्षण के अभाव में कर्मचारियों की कार्यकुशलता और निर्णय-क्षमता प्रभावित होती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव बैंक के प्रदर्शन पर पड़ता है। 6.5 राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रबंधन संबंधी समस्याएँ: सहकारी बैंकों में राजनीतिक हस्तक्षेप एक सामान्य लेकिन गंभीर समस्या रही है। सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक में भी ऋण स्वीकृति, वसूली प्रक्रिया और प्रबंधन निर्णयों में राजनीतिक दबाव देखने को मिलता है। इससे पेशेवर प्रबंधन की अवधारणा कमजोर होती है और बैंकिंग अनुशासन प्रभावित होता है। साथ ही, प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी बैंक की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए चुनौती उत्पन्न करती है। 7. निष्कर्ष (Conclusion) प्रस्तुत अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राजस्थान में केंद्रीय सहकारी बैंक ग्रामीण वित्तीय प्रणाली का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ हैं और सवाई माधोपुर जिले में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। इन बैंकों ने कृषि, पशुपालन, लघु एवं कुटीर उद्योगों तथा ग्रामीण उद्यमिता को संस्थागत ऋण उपलब्ध कराकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में निरंतर योगदान दिया है। सहकारी बैंकिंग प्रणाली ने साहूकारों पर ग्रामीण जनता की निर्भरता को कम किया है और वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया को गति प्रदान की है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक ने ऋण वितरण के क्षेत्र में सकारात्मक प्रगति की है, विशेष रूप से कृषि एवं पशुपालन ऋण में निरंतर वृद्धि के माध्यम से ग्रामीण उत्पादन गतिविधियों को प्रोत्साहन मिला है। ऋण वसूली की स्थिति में भी क्रमिक सुधार देखा गया है, यद्यपि प्राकृतिक आपदाओं, मानसून की अनिश्चितता और किसानों की आय अस्थिरता के कारण कुछ वर्षों में वसूली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसके अतिरिक्त, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की समस्या बैंक की वित्तीय स्थिरता के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि सहकारी बैंकों की लाभप्रदता सीमित रही है, जिसका प्रमुख कारण उनकी सेवा-आधारित कार्यप्रणाली, कम ब्याज दरों पर ऋण वितरण, ब्याज सब्सिडी और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन है। इसके बावजूद, सीमित लाभ के साथ भी केंद्रीय सहकारी बैंक ग्रामीण समाज के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही, शोध से यह स्पष्ट होता है कि तकनीकी आधुनिकीकरण की कमी, सीमित पूंजी आधार, कर्मचारियों के प्रशिक्षण का अभाव तथा राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे कारक बैंक की कार्यक्षमता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं। पेशेवर प्रबंधन और पारदर्शी प्रशासन के अभाव में सहकारी बैंक अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि यदि केंद्रीय सहकारी बैंकों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर पेशेवर प्रबंधन को सुदृढ़ किया जाए, डिजिटल बैंकिंग और तकनीकी नवाचारों को अपनाया जाए, मानव संसाधन विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए तथा प्रभावी ऋण वसूली और एनपीए नियंत्रण की रणनीतियाँ लागू की जाएँ, तो ये बैंक ग्रामीण विकास और वित्तीय समावेशन के अत्यंत सशक्त माध्यम बन सकते हैं। भविष्य में सहकारी बैंकिंग प्रणाली को सुदृढ़ बनाकर ही समावेशी ग्रामीण विकास और आर्थिक स्थिरता के लक्ष्यों को प्रभावी रूप से प्राप्त किया जा सकता है। 8. सुझाव (Suggestions) प्रस्तुत अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि सवाई माधोपुर जिले के केंद्रीय सहकारी बैंक की कार्यक्षमता और वित्तीय स्थिरता को सुदृढ़ करने के लिए बहुआयामी सुधारात्मक उपायों की आवश्यकता है। निम्नलिखित सुझाव सहकारी बैंकिंग प्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और टिकाऊ बनाने की दिशा में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। सबसे पहले, प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS) एवं जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCB) का पूर्ण डिजिटलीकरण किया जाना अत्यंत आवश्यक है। कोर बैंकिंग समाधान (CBS), ऑनलाइन लेखा प्रणाली, डिजिटल भुगतान, मोबाइल बैंकिंग तथा आधार-आधारित सेवाओं को लागू करने से बैंकिंग प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, गति और दक्षता आएगी। डिजिटलीकरण से न केवल प्रशासनिक लागत कम होगी, बल्कि ऋण वितरण और वसूली की निगरानी भी अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकेगी। दूसरे, ऋण वितरण से पूर्व प्रभावी क्रेडिट असेसमेंट प्रणाली अपनाई जानी चाहिए। ऋणग्राही की आय, पुनर्भुगतान क्षमता, फसल पैटर्न, जोखिम कारकों और पूर्व ऋण इतिहास का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है। इससे अनुत्पादक ऋण और भविष्य में एनपीए बनने की संभावना को कम किया जा सकता है। साथ ही, ऋण का उपयोग उद्देश्यपूर्ण और उत्पादक गतिविधियों में सुनिश्चित किया जा सकेगा। तीसरे, ऋण वसूली प्रणाली को तकनीक एवं प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना चाहिए। डिजिटल वसूली तंत्र, समयबद्ध स्मरण प्रणाली, ऑनलाइन भुगतान सुविधा तथा नियमित निगरानी से वसूली दर में सुधार संभव है। इसके अतिरिक्त, समय पर ऋण चुकाने वाले किसानों और ग्राहकों को ब्याज में छूट, प्रोत्साहन अथवा भविष्य में ऋण सुविधा में प्राथमिकता जैसी योजनाएँ लागू की जा सकती हैं, जिससे ऋण अनुशासन को बढ़ावा मिलेगा। चौथे, कर्मचारियों के लिए नियमित एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। बैंक कर्मियों को आधुनिक बैंकिंग तकनीकों, वित्तीय प्रबंधन, जोखिम मूल्यांकन, ग्राहक सेवा और डिजिटल उपकरणों के उपयोग में प्रशिक्षित करना आवश्यक है। प्रशिक्षित और दक्ष मानव संसाधन बैंक की कार्यकुशलता, पारदर्शिता और ग्राहकों के विश्वास को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अंततः, NABARD एवं राज्य सरकार के सहयोग से केंद्रीय सहकारी बैंक के पूंजी आधार को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। पर्याप्त पूंजी उपलब्ध होने से बैंक की ऋण विस्तार क्षमता बढ़ेगी, तकनीकी आधुनिकीकरण संभव होगा और वित्तीय स्थिरता को बल मिलेगा। साथ ही, कमजोर सहकारी बैंकों के पुनर्गठन और सुदृढ़ीकरण के लिए विशेष वित्तीय सहायता योजनाएँ लागू की जानी चाहिए। समग्र रूप से, यदि उपर्युक्त सुझावों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो सवाई माधोपुर जिले का केंद्रीय सहकारी बैंक न केवल अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत कर सकेगा, बल्कि ग्रामीण विकास, कृषि उन्नति और वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को भी अधिक प्रभावी ढंग से प्राप्त कर सकेगा। संदर्भ सूची (References) 1. अग्रवाल, ए. एन. 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| Published In | Volume 6, Issue 10, October 2025 |
| Published On | 2025-10-10 |
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