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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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पश्चिम मालवा में भील और भिलाला जनजातियों की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक प्रथाओं का संरक्षण और पुनरुद्धार

Author(s) जितेंद्र कुमार पटेल
Country India
Abstract पश्चिमी मालवा में भील और भिलाला जनजातियों की पारंपरिक कला और सांस्कृतिक प्रथाओं के संरक्षण और पुनरुद्धार का जिससे उनकी प्रथाओ का संरक्षण कर सके। भारत की सबसे प्राचीन जनजातियों में से एक, जो धनुष-तीर चलाने में निपुणता के लिए प्रसिद्ध हैं। ये प्रकृति पूजक होते हैं और इनके रीति-रिवाज प्रकृति से निकटता से जुड़े हुए हैं। भीलों का एक उप-समूह, जो अपेक्षाकृत अधिक विकसित माना जाता है। इनमें राजपूत संस्कृति का प्रभाव देखने को मिलता है और ये खुद को राजपूतों से जोड़कर देखते हैं। यह भील जनजाति की सबसे महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध कला है। यह केवल एक कला नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक है, जिसमें दीवारों पर देवी-देवताओं, जानवरों और प्रकृति से संबंधित चित्र बनाए जाते हैं। ये जनजाति विभिन्न हिंदू त्योहारों और अपने पारंपरिक अनुष्ठानों को मनाती है। फसल आने पर पिथौरा की पूजा करना एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। यह भील जनजाति की एक सामुदायिक पहल है, जिसमें भूजल संरक्षण, वनरोपण और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जाता है। विभिन्न संगठन और कलाकार भील कला को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करके इसे संरक्षित कर रहे हैं। इसे पारंपरिक दीवार कला से कैनवास और अन्य माध्यमों पर लाया जा रहा है। अध्ययन बताते हैं कि आधुनिक उपकरण और मीडिया पारंपरिक कला रूपों को प्रभावित कर रहे हैं। इसके बावजूद, लोक संस्कृति को संरक्षित करने के लिए पारंपरिक और आधुनिक तरीकों का संतुलित उपयोग करने की आवश्यकता है। हालामा जैसी पारंपरिक प्रथाओं का पुनरुद्धार सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से किया जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत भी जीवित रह रही है। मध्य प्रदेश सरकार ने समय-समय पर पश्चिम मालवा में अवस्थित भील - भिलाला जनजातियों के पारंपरिक एवं सांस्कृतिक प्रथाओं का संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए कई योजनाएं बनाई है, जिससे वह उनका संरक्षण कर सके ।
Keywords पश्चिमी मालवा, संरक्षण, भील जनजाति, विभिन्न संगठन, सांस्कृतिक, प्रथाओं, पुनरुद्धार, पारंपरिक
Field Arts
Published In Volume 6, Issue 9, September 2025
Published On 2025-09-30

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