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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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धातु शिल्प का अद्भुत नमूना बैतूल जिले की भरेवाकला

Author(s) पुष्पादेवी साहू
Country India
Abstract इस शोध पत्र मे हम बैतूल जिले के टिगरिया गांव में कला और संस्कृति का विकास मुख्य रूप से भरैवा शिल्प कला का अध्ययन किया है। ढोकरा एक प्राचीन अलौह धातु ढलाई तकनीक है जिसमें मोम की लुप्त विधि का उपयोग किया जाता है। यह शिल्प न केवल एक हस्तकला है बल्कि गोंड जनजातियों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ढोकरा की कलाकृतियां केवल सजावटी वस्तुएं नहीं होतीं। बल्कि इनका गहरा सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व होता है। इनका उपयोग विवाह समारोहों धार्मिक अनुष्ठानों और जनजातीय देवी-देवताओं के लिए होता है। यह शिल्प प्राकृतिक मोम, गोंद, मिट्टी और गाय के गोबर के मिश्रण से बनाया जाता है, जिसमें जटिल डिजाइन और रूपांकन होते हैं। इसकी हस्तनिर्मित और देहाती सुंदरता प्रत्येक टुकड़े को अनूठा बनाती है। परंपरागत रूप से अनुष्ठानों के लिए वस्तुओं को बनाने वाले कारीगरों ने समय के साथ आधुनिक बाजार की मांग के अनुसार नए और आकर्षक डिजाइन विकसित किए हैं। इससे कला का संरक्षण सुनिश्चित हुआ है और कारीगरों को आजीविका का साधन मिला है। मध्य प्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम जैसी संस्थाओं ने इस कला को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कारीगरों को बाजार से जोड़ा है और ढोकरा को स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर बढ़ावा दिया है।
Keywords कला, मोम, स्थानीय, जनजाति, बैतूल, ढोकरा, भरैवा, देवी-देवताओं, पुनर्जीवित
Field Arts
Published In Volume 6, Issue 9, September 2025
Published On 2025-09-04
DOI https://doi.org/10.70528/IJLRP.v6.i9.1729
Short DOI https://doi.org/g93mnj

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