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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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भारतीय संविधान में ट्रांसजेंडर समुदाय के मानवाधिकारों का विश्लेषण

Author(s) ओम प्रकाश चौरसिया, प्रियंका यादव
Country India
Abstract हमारे राष्ट्र भारत में अनेकों आक्रांताओं ने आक्रमण किये और अनेकों विदेशियों को शरण प्राप्त की। भारत वासियों द्वारा काफी लम्बे समय तक आज़ादी के विभिन्न आन्दोलन किये गये और अंतिम स्वतंत्रता वर्ष 1947 में अंग्रेजों से मिली। वर्ष 1947 से ही भारतवर्ष को आजाद राष्ट्र माना जाता है। इसी क्रम में वर्ष 1950 में भारत को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र होने का गौरव प्रदान हुआ, साथ ही सभी भारत के नागरिकों को भारतीय संविधान की प्राप्ति हुई। इस संविधान में नागरिकों को राष्ट्र की नागरिकता, उनके मौलिक अधिकार एवं मूल कर्तव्यों का लिखित विधान प्राप्त हुआ, किन्तु इन सभी के बाबजूद हमारे राष्ट्र भारत में एक समुदाय ऐसा भी है जिसे आज़ादी के पूर्व अंग्रेजों द्वारा क्रिमिनल ट्राइब होने का कलंक मिला था, लेकिन आज़ादी के बाद भी इन्हें सिर्फ राष्ट्र में तिरस्कार मिला किन्तु इनका अस्तित्व राष्ट्र में कहां है यह सुनिश्चित नहीं हुआ। आज़ादी के वर्षों बाद इस किन्नर समुदाय द्वारा अपने अस्तित्व के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गयी, तब वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद इस समुदाय से जुड़े लोगों को तृतीय लिंग के रुप में अपने ही राष्ट्र में अपनी पहचान मिली। आज सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को एक दशक बीत चुका है। इस शोध पत्र के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के प्रभाव का अवलोकन कर किन्नर समुदाय के स्तर की प्रगति की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया गया है।
Keywords ट्रांसजेंडर समुदाय, भारतीय संविधान, मानवाधिकार एवं सामाजिक समावेशन।
Field Sociology > Education
Published In Volume 6, Issue 7, July 2025
Published On 2025-07-24
DOI https://doi.org/10.70528/IJLRP.v6.i7.1676
Short DOI https://doi.org/g9t2x9

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