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E-ISSN: 2582-8010   •   Impact Factor: 9.56

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सामाजिक न्याय और समावेशी विकास: एक समीक्षात्मक विश्लेषण

Author(s) विकाश कुमार विधाता
Country India
Abstract सामाजिक न्याय और समावेशी विकास आधुनिक भारत की विकास यात्रा के दो अभिन्न स्तंभ हैं। सामाजिक न्याय का अर्थ है समाज के सभी वर्गों, विशेषकर वंचित, दलित, पिछड़े, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को समान अवसर, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना। समावेशी विकास उस आर्थिक वृद्धि को संदर्भित करता है जिसमें विकास के लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें, न कि केवल कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित रहें। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 46 इन सिद्धांतों को नीति निर्देशक तत्वों के रूप में स्थापित करते हैं।
स्वतंत्रता के बाद से भारत ने भूमि सुधार, आरक्षण नीति, मनरेगा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, शिक्षा का अधिकार और जन धन योजना जैसी अनेक पहलों के माध्यम से इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया है। अमर्त्य सेन के 'क्षमताओं का विकास' सिद्धांत और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के सामाजिक न्याय के विचार इस क्षेत्र में आधारभूत रहे हैं। फिर भी, आर्थिक उदारीकरण के बाद बढ़ती असमानता, अमीर-गरीब की खाई, क्षेत्रीय असंतुलन, लिंग भेद और जातिगत भेदभाव समावेशी विकास की राह में बाधाएं बने हुए हैं। ऑक्सफैम रिपोर्ट्स के अनुसार शीर्ष 1% के पास राष्ट्रीय संपत्ति का बड़ा हिस्सा केंद्रित है जबकि निचले वर्गों की स्थिति सुधरने की गति धीमी है।
यह अध्ययन इन नीतियों की सफलताओं जैसे गरीबी उन्मूलन में कमी, साक्षरता वृद्धि और वित्तीय समावेशन के साथ-साथ विफलताओं जैसे क्रियान्वयन की कमी, भ्रष्टाचार और लक्षित वर्गों तक पहुंच की कमी का समीक्षात्मक विश्लेषण करता है। समावेशी विकास केवल GDP वृद्धि नहीं बल्कि मानव विकास सूचकांक (HDI), स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने वाला होना चाहिए। वर्तमान में आत्मनिर्भर भारत, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाएं नई दिशा दे रही हैं, परंतु जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी और सामाजिक विभेद नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रहे हैं।
निष्कर्षतः सामाजिक न्याय को विकास प्रक्रिया का अभिन्न अंग बनाना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में समानता सुनिश्चित कर, शासन में पारदर्शिता लाकर और वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाकर ही सच्चा समावेशी विकास संभव है। यह न केवल नैतिक दायित्व है बल्कि सतत और स्थिर राष्ट्र निर्माण की आवश्यकता भी है।
Published In Volume 7, Issue 5, May 2026
Published On 2026-05-22

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