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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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महात्मा गांधी के शिक्षा दर्शन में आत्मनिर्भरता की अवधारणा और NEP - 2020

Author(s) लक्ष्मीकांत नेमा
Country India
Abstract यह शोध पत्र महात्मा गांधी के शिक्षा दर्शन के सिद्धांतों एवं उसकी व्यवहारिकता का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। गांधीजी ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का साधन न मानकर व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का माध्यम माना है, जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों आयामों का संतुलित विकास शामिल है। उनके शिक्षा दर्शन का प्रमुख आधार ‘नई तालीम’ है, जो कार्य-आधारित शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा नैतिक मूल्यों पर आधारित है। इस अध्ययन में गांधीजी के शिक्षा संबंधी विचारों जैसे—सत्य, अहिंसा, श्रम की गरिमा, मातृभाषा में शिक्षा तथा चरित्र निर्माण—का विश्लेषण किया गया है। शोध में गुणात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए द्वितीयक स्रोतों, जैसे पुस्तकों, शोध पत्रों एवं सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन किया गया है। इसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि गांधीवादी शिक्षा सिद्धांत व्यवहार में किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि गांधीजी का शिक्षा दर्शन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर वर्तमान समय में जब शिक्षा अधिकतर परीक्षा और रोजगार तक सीमित हो गई है। नई शिक्षा नीति 2020 में भी गांधीवादी शिक्षा के तत्व, जैसे कौशल विकास, अनुभवात्मक अधिगम तथा मूल्य-आधारित शिक्षा, स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। हालांकि, आधुनिक तकनीकी युग में गांधीवादी शिक्षा के पूर्ण कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जैसे संसाधनों की कमी, पारंपरिक शिक्षा प्रणाली का प्रभुत्व तथा तकनीकी शिक्षा के साथ संतुलन की आवश्यकता। अतः यह कहा जा सकता है कि यदि गांधीजी के शिक्षा सिद्धांतों को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप संशोधित कर लागू किया जाए, तो यह शिक्षा प्रणाली को अधिक मानवीय, व्यावहारिक एवं प्रभावी बना सकता है।
Keywords सत्य, अहिंसा,स्वावलंबन, श्रम-प्रतिष्ठा, नैतिकता ,चरित्र-निर्माण, आत्मनिर्भरता सर्वांगीण विकास,ग्राम-स्वराज,बुनियादी शिक्षा (नई तालीम),सहयोग,अनुशासन,सादगी,सेवा भाव,जीवनोपयोगी शिक्षा
Field Arts
Published In Volume 7, Issue 4, April 2026
Published On 2026-04-28
DOI https://doi.org/10.70528/IJLRP.v7.i4.2137
Short DOI https://doi.org/hb27th

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