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E-ISSN: 2582-8010
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Volume 7 Issue 4
April 2026
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पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारतीय अधिनियमों की उपयोगिता का समालोचनात्मक विश्लेषण
| Author(s) | डॉ. राकेश कुमार जायसवाल |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | पर्यावरणीय संकट इक्कीसवीं सदी की सबसे गंभीर वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों में से एक है। भारत जैसे विशाल, बहुलतावादी, विकासोन्मुख और जनसंख्या-सघन देश में पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न केवल प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, आजीविका, सामाजिक न्याय, शासन, संघवाद, मानवीय गरिमा और सतत विकास से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता के पश्चात प्रारंभिक दशकों में भारतीय राज्य की प्राथमिकताएँ औद्योगिक विकास, कृषि विस्तार, अवसंरचनात्मक निर्माण और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण पर केंद्रित रहीं; किंतु 1970 के दशक से पर्यावरणीय क्षरण, प्रदूषण, वनों की कटाई, जैव-विविधता के विनाश और औद्योगिक दुर्घटनाओं ने विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता को तीव्र बना दिया। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974; वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980; वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981; पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986; सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम, 1991; जैव-विविधता अधिनियम, 2002; वनाधिकार अधिनियम, 2006; तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 जैसे महत्त्वपूर्ण कानून अस्तित्व में आए। भारतीय न्यायपालिका ने भी अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा मानते हुए पर्यावरणीय न्यायशास्त्र को समृद्ध किया। यह शोधपत्र पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारतीय अधिनियमों की उपयोगिता का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य केवल प्रमुख कानूनों का वर्णन करना नहीं, बल्कि यह परखना है कि पर्यावरणीय शासन, प्रदूषण नियंत्रण, वन एवं जैव-विविधता संरक्षण, पर्यावरणीय न्याय, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, औद्योगिक दायित्व और सतत विकास के संदर्भ में ये अधिनियम कितने प्रभावी सिद्ध हुए हैं। अध्ययन में भारतीय संविधान के पर्यावरणीय प्रावधानों, प्रमुख कानूनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनकी संस्थागत संरचना, कार्यान्वयन-तंत्र, न्यायिक व्याख्याओं, प्रशासनिक चुनौतियों, संघीय जटिलताओं और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों का विस्तृत परीक्षण किया गया है। शोधपत्र यह भी दर्शाता है कि भारतीय पर्यावरणीय कानूनों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक व्यापक और सशक्त वैधानिक आधार अवश्य उपलब्ध कराया है, किन्तु उनकी वास्तविक उपयोगिता कई कारणों से सीमित हुई है—जैसे प्रदूषण नियंत्रण संस्थाओं की कमजोर क्षमता, परियोजना-स्वीकृति में औपचारिकता, पर्यावरण प्रभाव आकलन की अपूर्णता, डेटा-अपारदर्शिता, उद्योग-प्रशासन गठजोड़, स्थानीय समुदायों की अपर्याप्त भागीदारी, दंडात्मक प्रावधानों का कमजोर प्रयोग, और पर्यावरणीय न्याय तक असमान पहुँच। शोध का निष्कर्ष यह है कि भारतीय अधिनियम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अनिवार्य विधिक आधार प्रदान करते हैं, किंतु वे तभी प्रभावी हो सकते हैं जब उनका क्रियान्वयन पारदर्शी, वैज्ञानिक, जवाबदेह, विकेंद्रीकृत और सामाजिक न्याय-समर्थ हो। पर्यावरणीय विधायन की उपयोगिता कानूनों की संख्या में नहीं, बल्कि उनके जीवंत और निष्पक्ष अनुपालन में निहित है। अतः वर्तमान समय की आवश्यकता यह है कि भारतीय पर्यावरणीय कानूनों को केवल विनियामक औजार के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता, पर्यावरणीय लोकतंत्र और सतत विकास के वाहक के रूप में पुनर्संगठित किया जाए। |
| Keywords | पर्यावरण संरक्षण, भारतीय अधिनियम, पर्यावरणीय कानून, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, वन संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जैव-विविधता, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, सतत विकास |
| Published In | Volume 2, Issue 6, June 2021 |
| Published On | 2021-06-04 |
| DOI | https://doi.org/10.70528/IJLRP.v2.i6.2118 |
| Short DOI | https://doi.org/hbxcx7 |
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10.70528/IJLRP
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