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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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जल संसाधन का अर्थशास्त्र और सतत विकास की चुनौतियाँ: सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की सिंचाई परियोजनाओं का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author(s) प्रेमजीत निराला
Country India
Abstract जल संसाधन किसी भी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। विशेषकर कृषि-प्रधान जिलों में जल की उपलब्धता उत्पादन, आय, रोजगार, प्रवास तथा सामाजिक स्थिरता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में स्थित केडार एवं पुटका सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से जल संसाधनों के आर्थिक महत्व, उपयोग, गिरती सिंचाई क्षमता तथा भूमिगत जल स्तर के प्रभावों का विश्लेषण करना है। आकड़ों के आधार पर 2013–14 से 2024–25 तक के सिंचाई क्षेत्र, अनुबंधित क्षेत्र, ग्रामों की संख्या तथा वास्तविक सिंचाई क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि नहर आधारित सिंचाई में कमी और निजी नलकूपों पर निर्भरता बढ़ने से भूजल स्तर पर दबाव बढ़ रहा है । अध्ययन का मुख्य उद्देश्य सारंगढ़ - बिलाईगढ़ जिले में उपलब्ध सिंचाई परियोजनाओं, वर्षा की मात्रा तथा जल उपयोग की स्थिति का विश्लेषण करना तथा उनके कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन करना |
अध्ययन से प्राप्त निष्कर्षों से यह स्पष्ट होता है कि सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि जिन क्षेत्रों में नहर, ट्यूबवेल तथा अन्य सिंचाई साधनों की उपलब्धता अधिक है, वहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन तथा किसानों की आय अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। वहीं वर्षा की अनिश्चितता वाले क्षेत्रों में कृषि उत्पादन में उतार-चढ़ाव अधिक देखा गया। यह परिणाम पूर्व के अध्ययनों से भी मेल खाते हैं, यह भी स्पष्ट हुआ कि जल उपलब्धता, सिंचाई अवसंरचना तथा वर्षा का स्तर कृषि उत्पादन के प्रमुख निर्धारक कारक हैं। अतः यह आवश्यक है कि जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन तथा आधुनिक सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों (ड्रिप एवं स्प्रिंकलर) को प्रोत्साहित किया जाए। अध्ययन यह सुझाव देता है कि यदि जल संसाधनों का समुचित प्रबंधन और वैज्ञानिक उपयोग सुनिश्चित किया जाए तो क्षेत्र में कृषि उत्पादकता, किसानों की आय तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सतत विकास को सुदृढ़ किया जा सकता है। जल संसाधनों के समुचित प्रबंधन के बिना सतत विकास लक्ष्य (SDGs) की प्राप्ति संभव नहीं है। अतः सामुदायिक प्रबंधन, आधुनिक सिंचाई तकनीक, नहर सुधार, जल मूल्य निर्धारण एवं भूजल पुनर्भरण जैसी रणनीतियाँ आवश्यक हैं।
Keywords जल अर्थशास्त्र, सतत विकास, सिंचाई परियोजना, भूजल स्तर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जल प्रबंधन
Field Sociology > Economics
Published In Volume 7, Issue 3, March 2026
Published On 2026-03-30
DOI https://doi.org/10.70528/IJLRP.v7.i3.2029
Short DOI https://doi.org/hbvwc3

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