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E-ISSN: 2582-8010
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Volume 7 Issue 3
March 2026
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बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की कूटनीतिक भूमिका
| Author(s) | सुरेश चंद गुप्ता |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। शीत युद्ध के बाद उभरी एकध्रुवीय व्यवस्था अब बहुध्रुवीयता की ओर अग्रसर है, जहाँ शक्ति का संतुलन पश्चिम से पूर्व, उत्तर से दक्षिण तथा राज्य-केन्द्रित व्यवस्था से बहु-अभिनेताओं (राज्य, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय संगठन, तकनीक मंच) की ओर स्थानांतरित हो रहा है। इस संदर्भ में भारत की कूटनीतिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। भारत न केवल विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक आबादी और उभरती अर्थव्यवस्था है, बल्कि वह रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व के माध्यम से नई विश्व व्यवस्था को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। यह शोध पत्र बदलती वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख आयामों, भारत की कूटनीतिक परंपराओं, समकालीन विदेश नीति की प्राथमिकताओं, बहुपक्षीय मंचों पर भूमिका, प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों, क्षेत्रीय कूटनीति, आर्थिक और तकनीकी कूटनीति, सुरक्षा एवं रक्षा कूटनीति तथा भविष्य की चुनौतियों और अवसरों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। कुंजी शब्द: वैश्विक व्यवस्था, बहुध्रुवीयता, रणनीतिक स्वायत्तता, भारतीय कूटनीति, वैश्विक दक्षिण ________________________________________ 1. प्रस्तावना 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है जहाँ पुरानी शक्ति-संरचनाएँ कमजोर पड़ रही हैं और नई शक्तियाँ उभर रही हैं। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद स्थापित एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था अब स्थिर नहीं रही। वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, जलवायु परिवर्तन, महामारी, ऊर्जा संकट, आतंकवाद तथा क्षेत्रीय संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रकृति को अधिक जटिल, अनिश्चित और बहुआयामी बना दिया है। अब केवल सैन्य शक्ति ही निर्णायक तत्व नहीं है, बल्कि आर्थिक क्षमता, तकनीकी प्रभुत्व, सूचना नियंत्रण, कूटनीतिक विश्वसनीयता और सांस्कृतिक प्रभाव भी वैश्विक शक्ति को परिभाषित करते हैं। इस बदलते परिदृश्य में भारत की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के साथ-साथ एक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था, विशाल उपभोक्ता बाजार, युवा जनसंख्या और समृद्ध सभ्यतागत विरासत वाला देश है। लंबे समय तक गुटनिरपेक्षता और नैतिक कूटनीति का पक्षधर रहने वाला भारत आज एक अधिक सक्रिय, व्यावहारिक और हित-आधारित विदेश नीति अपना रहा है। भारत की कूटनीति अब केवल आदर्शवाद तक सीमित न रहकर यथार्थवाद और वैश्विक उत्तरदायित्व के संतुलन पर आधारित हो गई है। यह शोध पत्र बदलती वैश्विक व्यवस्था की पृष्ठभूमि में भारत की कूटनीतिक भूमिका का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें भारत की विदेश नीति के ऐतिहासिक विकास, समकालीन सिद्धांतों, बहुपक्षीय मंचों पर भूमिका, प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों, क्षेत्रीय एवं वैश्विक कूटनीति तथा भविष्य की चुनौतियों और संभावनाओं पर गहन चर्चा की गई है। ________________________________________ 2. अध्ययन के उद्देश्य प्रस्तुत शोध पत्र के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं: 1. बदलती वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख आयामों का विश्लेषण करना। 2. भारत की विदेश नीति के समकालीन सिद्धांतों की व्याख्या करना। 3. बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भूमिका का मूल्यांकन करना। 4. प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ भारत के संबंधों का अध्ययन करना। 5. भारत की कूटनीति के समक्ष भविष्य की चुनौतियों और संभावनाओं की पहचान करना। अनुसंधान पद्धति (Research Methodology) यह अध्ययन वर्णनात्मक एवं विश्लेषणात्मक प्रकृति का है। शोध के लिए द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है, जिनमें पुस्तकों, शोध पत्रिकाओं, सरकारी रिपोर्टों, विदेश मंत्रालय के दस्तावेज़ों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्टों को शामिल किया गया है। उपलब्ध तथ्यों का विश्लेषण करके निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं। 3. बदलती वैश्विक व्यवस्था: प्रमुख आयाम 3.1 एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीयता की ओर शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात अमेरिका के नेतृत्व में एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था स्थापित हुई, जिसमें सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण स्पष्ट था। किंतु 21वीं सदी में चीन का तीव्र आर्थिक और सैन्य उदय, रूस की रणनीतिक पुनर्सक्रियता, यूरोपीय संघ की सामूहिक शक्ति तथा भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के बढ़ते प्रभाव ने इस व्यवस्था को चुनौती दी है। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में शक्ति का वितरण अधिक संतुलित होता है, जिससे छोटे और मध्यम देशों को भी अपनी आवाज़ उठाने का अवसर मिलता है। 3.2 भू-आर्थिक परिवर्तन आधुनिक वैश्विक राजनीति में अर्थव्यवस्था एक प्रमुख कूटनीतिक हथियार बन चुकी है। व्यापार युद्ध, आर्थिक प्रतिबंध, निवेश प्रवाह, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला नियंत्रण जैसे मुद्दे देशों की विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं। भारत ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी भूमिका सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है। 3.3 तकनीक, साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम तकनीक, सेमीकंडक्टर, 5G/6G नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान आज नई शक्ति संरचना के आधार स्तंभ हैं। तकनीकी आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सहयोग भारत की कूटनीति का एक महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। 3.4 वैश्विक चुनौतियाँ और सामूहिक उत्तरदायित्व जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य संकट, आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा और प्रवासन जैसी चुनौतियाँ सीमाओं से परे हैं। इनके समाधान के लिए सहयोगात्मक और बहुपक्षीय प्रयास आवश्यक हैं, जहाँ भारत एक जिम्मेदार और रचनात्मक भागीदार के रूप में उभर रहा है। ________________________________________ 4. भारतीय कूटनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति का आधार पंचशील, गुटनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व रहा। नेहरू युग से लेकर शीत युद्ध के अंत तक भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी। 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के साथ कूटनीति अधिक व्यावहारिक और विकासोन्मुख हुई। 4. समकालीन भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत 4.1 रणनीतिक स्वायत्तता भारत किसी एक शक्ति गुट के साथ बंधने के बजाय मुद्दा-आधारित साझेदारियाँ बनाता है। 4.2 बहुपक्षवाद और नियम-आधारित व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र सुधार, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान और वैश्विक शासन में समान प्रतिनिधित्व भारत की प्रमुख मांगें हैं। 4.3 विकास-केंद्रित कूटनीति विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य घरेलू विकास, निवेश, तकनीक और रोजगार के अवसर बढ़ाना है। ________________________________________ 5. बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भूमिका 5.1 संयुक्त राष्ट्र में भारत भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सबसे अधिक सैनिक योगदान देने वाले देशों में शामिल है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है, ताकि वैश्विक शासन संरचना अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और लोकतांत्रिक बन सके। 5.2 G20 में भारत की भूमिका G20 मंच पर भारत ने विकासशील देशों की चिंताओं—जैसे ऋण राहत, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, जलवायु वित्त और सतत विकास—को वैश्विक एजेंडे में प्रमुखता से उठाया है। 5.3 ब्रिक्स, एससीओ और अन्य मंच ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंच बहुध्रुवीयता को मजबूत करते हैं और वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज़ को सशक्त बनाते हैं। भारत इन मंचों के माध्यम से वैकल्पिक वैश्विक शासन ढाँचे को प्रोत्साहित करता है। ________________________________________ 6. प्रमुख शक्तियों के साथ भारत के संबंध 6.1 अमेरिका रणनीतिक, रक्षा, तकनीकी और आर्थिक सहयोग बढ़ा है, पर भारत स्वतंत्र निर्णय क्षमता बनाए रखता है। 6.2 रूस ऊर्जा, रक्षा और ऐतिहासिक विश्वास पर आधारित संबंध, बदलते वैश्विक संदर्भ में संतुलन की मांग करते हैं। 6.3 चीन प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का मिश्रण; सीमा विवाद और आर्थिक संबंध समानांतर चलते हैं। 6.4 यूरोपीय संघ और जापान मूल्य-आधारित साझेदारी, व्यापार और हरित प्रौद्योगिकी में सहयोग। ________________________________________ 7. क्षेत्रीय कूटनीति 7.1 पड़ोसी प्रथम नीति दक्षिण एशिया में संपर्क, विकास सहायता और मानवीय सहयोग पर जोर। 7.2 इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण मुक्त, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक भारत की समुद्री कूटनीति का केंद्र है। 7.3 अफ्रीका और लैटिन अमेरिका विकास साझेदारी, क्षमता निर्माण और ऊर्जा सहयोग। ________________________________________ 8. आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक कूटनीति 8.1 आर्थिक कूटनीति व्यापार समझौते, निवेश आकर्षण और आपूर्ति शृंखला एकीकरण। 8.2 तकनीकी कूटनीति डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, फिनटेक और अंतरिक्ष सहयोग। 8.3 सांस्कृतिक और सॉफ्ट पावर योग, आयुष, प्रवासी भारतीय और सांस्कृतिक आदान-प्रदान। ________________________________________ 9. सुरक्षा और रक्षा कूटनीति आतंकवाद विरोध, रक्षा साझेदारियाँ, संयुक्त अभ्यास और समुद्री सुरक्षा भारत की प्राथमिकताएँ हैं। आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन से रणनीतिक विश्वसनीयता बढ़ी है। ________________________________________ 10. चुनौतियाँ और सीमाएँ सीमावर्ती तनाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, जलवायु जोखिम, तकनीकी निर्भरता और संस्थागत सुधारों की आवश्यकता भारत की कूटनीति के समक्ष चुनौतियाँ हैं। ________________________________________ 11. भविष्य की संभावनाएँ भारत यदि समावेशी विकास, तकनीकी नेतृत्व और जिम्मेदार वैश्विक भूमिका को संतुलित करता है, तो वह 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था का प्रमुख स्तंभ बन सकता है। ________________________________________ आर्थिक लाभ एवं वित्तीय भार का विश्लेषण जब हम 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की बात करते हैं, तो सबसे प्रबल तर्क 'वित्तीय मितव्ययिता' (Economic Frugality) का दिया जाता है। भारतीय निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1952 के पहले आम चुनाव में सरकारी खर्च मात्र ₹10.45 करोड़ था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में यह बढ़कर ₹3,870 करोड़ और 2019 में लगभग ₹10,000 करोड़ (केवल सरकारी रिकॉर्ड पर) पहुँच गया। यदि इसमें राजनीतिक दलों द्वारा किया गया अनौपचारिक खर्च जोड़ दिया जाए, तो 'सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज' (CMS) की रिपोर्ट के अनुसार 2019 के चुनाव में कुल ₹60,000 करोड़ खर्च हुए, जो इसे दुनिया का सबसे महंगा चुनाव बनाता है। निरंतर चुनावों के कारण होने वाले इस खर्च को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है: 1. प्रत्यक्ष सरकारी खर्च: इसमें EVM/VVPAT की खरीद, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, और चुनाव ड्यूटी पर तैनात लाखों कर्मचारियों का भत्ता शामिल है। 2. सुरक्षा बलों का आवागमन: भारत में निष्पक्ष चुनाव के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की भारी आवश्यकता होती है। जब अलग-अलग राज्यों में चुनाव होते हैं, तो इन बलों को ट्रेन और हवाई जहाज के माध्यम से निरंतर एक छोर से दूसरे छोर भेजा जाता है, जिसका परिवहन खर्च अरबों में होता है। 3. अप्रत्यक्ष आर्थिक हानि: बार-बार लगने वाली 'आदर्श आचार संहिता' (MCC) के कारण विकास परियोजनाएं ठप हो जाती हैं। नीति आयोग के एक अध्ययन के अनुसार, चुनावी मौसम में नीतिगत निर्णय लेने में होने वाली देरी से देश की GDP वृद्धि दर पर सूक्ष्म रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ________________________________________ 12. निष्कर्ष बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की कूटनीतिक भूमिका निरंतर विकसित हो रही है। भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद और विकास-केंद्रित दृष्टिकोण को अपनाकर अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक उत्तरदायित्वों के बीच संतुलन स्थापित किया है। आज भारत न केवल एक उभरती शक्ति है, बल्कि वैश्विक समस्याओं के समाधान में एक जिम्मेदार भागीदार भी है। आगामी वर्षों में भारत की कूटनीतिक सफलता उसकी आंतरिक आर्थिक मजबूती, तकनीकी क्षमता, संस्थागत सुधारों और वैश्विक साझेदारियों की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी। यदि भारत इन सभी क्षेत्रों में संतुलित प्रगति करता है, तो वह 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। ________________________________________ संदर्भ सूची: 1. ए.पी. राणा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सिद्धांत, मैकमिलन, नई दिल्ली। 2. जे.एन. दीक्षित, भारत की विदेश नीति, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस। 3. सुमित गांगुली, Indian Foreign Policy: Retrospect and Prospect, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस।. 4. शशि थरूर, Pax Indica: India and the World of the 21st Century, पेंगुइन। 5. राजीव सिकरी, Challenges and Strategy: Rethinking India’s Foreign Policy, सेज पब्लिकेशंस। 6. विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, वार्षिक रिपोर्ट। 7. नीति आयोग, भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर रिपोर्टें। 8. संयुक्त राष्ट्र, UN Peacekeeping Operations Report। 9. विश्व बैंक, World Development Report। 10. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, World Economic Outlook। 11. ब्रिक्स और G20 शिखर सम्मेलनों की आधिकारिक घोषणाएँ। 12. रामचंद्र गुहा, भारत और विश्व राजनीति, पेंगुइन। 13. सी. राजा मोहन, India and the Asian Geopolitics, ऑक्सफोर्ड। 14. आई.सी.डब्ल्यू.ए. (ICWA) जर्नल्स और शोध पत्र। 15. समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंध पत्रिकाएँ (Foreign Affairs, International Studies)। |
| Keywords | . |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 6, Issue 7, July 2025 |
| Published On | 2025-07-09 |
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