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E-ISSN: 2582-8010     Impact Factor: 9.56

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मध्य भारत के शक्ति संतुलन में पिंडारियो के संघर्ष का ऐतिहासिक विश्लेषण

Author(s) विराग जैन, डॉ. सुनीता मालवीय
Country India
Abstract पिंडारी मध्य भारत के शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनियमित घुड़सवार थे, जो 17वीं से 19वीं शताब्दी तक सक्रिय रहे । मूल रूप से, वे मुगल सेना के साथ जुड़े थे, बाद में मराठा सेनाओं के साथ काम करने लगे, और अंततः स्वतंत्र रूप से लूटपाट करने लगे । पिंडारियों का उल्लेख पहली बार 1689 में औरंगजेब के दक्कन अभियान के दौरान मिलता है । वे मुख्य रूप से मुस्लिम थे, हालांकि उनकी जाति और धर्म मिश्रित थे । पिंडारी समूहों में सिंधिया शाही और होल्कर शाही प्रमुख थे, जो मराठा सरदारों से जुड़े थे । 1800-1815 के दौरान, उनकी संख्या 20,000 से 30,000 तक पहुंच गई, जो स्थानीय सुल्तानों और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खतरा बन गए । पिंडारी हमलों से मध्य भारत में व्यापक आर्थिक और सामाजिक नुकसान हुआ । 1817-1818 में लॉर्ड हेस्टिंग्स के नेतृत्व में ब्रिटिशों ने पिंडारी युद्ध शुरू किया । इस युद्ध में पिंडारियों को पराजित किया गया, और उनके कई नेता पकड़े गए या मारे गए । इस जीत से ब्रिटिशों ने मध्य भारत में अपनी पकड़ मजबूत की । यह शोध पिंडारियों की मध्य भारत के शक्ति संतुलन में बदलाव और ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को दर्शाता है ।
Keywords मध्यभारत, ब्रिटिश साम्राज्य, पिंडारी, आर्थिक और सामाजिक नुकसान, मुगल
Field Arts
Published In Volume 6, Issue 12, December 2025
Published On 2025-12-28

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