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E-ISSN: 2582-8010
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Volume 7 Issue 1
January 2026
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मध्य भारत के शक्ति संतुलन में पिंडारियो के संघर्ष का ऐतिहासिक विश्लेषण
| Author(s) | विराग जैन, डॉ. सुनीता मालवीय |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | पिंडारी मध्य भारत के शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अनियमित घुड़सवार थे, जो 17वीं से 19वीं शताब्दी तक सक्रिय रहे । मूल रूप से, वे मुगल सेना के साथ जुड़े थे, बाद में मराठा सेनाओं के साथ काम करने लगे, और अंततः स्वतंत्र रूप से लूटपाट करने लगे । पिंडारियों का उल्लेख पहली बार 1689 में औरंगजेब के दक्कन अभियान के दौरान मिलता है । वे मुख्य रूप से मुस्लिम थे, हालांकि उनकी जाति और धर्म मिश्रित थे । पिंडारी समूहों में सिंधिया शाही और होल्कर शाही प्रमुख थे, जो मराठा सरदारों से जुड़े थे । 1800-1815 के दौरान, उनकी संख्या 20,000 से 30,000 तक पहुंच गई, जो स्थानीय सुल्तानों और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए खतरा बन गए । पिंडारी हमलों से मध्य भारत में व्यापक आर्थिक और सामाजिक नुकसान हुआ । 1817-1818 में लॉर्ड हेस्टिंग्स के नेतृत्व में ब्रिटिशों ने पिंडारी युद्ध शुरू किया । इस युद्ध में पिंडारियों को पराजित किया गया, और उनके कई नेता पकड़े गए या मारे गए । इस जीत से ब्रिटिशों ने मध्य भारत में अपनी पकड़ मजबूत की । यह शोध पिंडारियों की मध्य भारत के शक्ति संतुलन में बदलाव और ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को दर्शाता है । |
| Keywords | मध्यभारत, ब्रिटिश साम्राज्य, पिंडारी, आर्थिक और सामाजिक नुकसान, मुगल |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 6, Issue 12, December 2025 |
| Published On | 2025-12-28 |
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10.70528/IJLRP
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