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E-ISSN: 2582-8010
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Volume 7 Issue 7
July 2026
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मध्यकालीन भारत में शिक्षा व्यवस्था की समीक्षात्मक अध्ययन
| Author(s) | आशा सुनारीवाल |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | मध्यकालीन भारत (लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी) का कालखंड राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत परिवर्तनशील रहा। इस युग में शिक्षा व्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा। यह समय इतवंकसल दो प्रमुख चरणों में बाँटा जा सकता है - हिंदू राजाओं का काल और मुस्लिम शासन का काल (मुख्यतः दिल्ली सल्तनत और मुगल काल)। इन दोनों चरणों में शिक्षा की व्यवस्था, उद्देश्य, माध्यम और स्वरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलते हैं। भारत में मुस्लिम शासन स्थापित होने से पहले यहाँ प्राचीन व बौद्ध कालीन शिक्षा व्यवस्था ही चल रही थी, लेकिन मुस्लिम शासक भारतीयों से अलग भाषा व संस्कृति से संबंधित थे और उन्होनें उसी को बढ़ावा दिया। मुस्लिम शासकों ने मस्जिदें, मकतब व मदरसों का निर्माण कराया तथा इन्हीं के माध्यम से शिक्षण कार्य को प्रोत्साहित किया। प्राचीन भारतीय शिक्षा आश्रय न मिलने के कारण समाप्ति की कागार पर थी। फारसी भाषा को राजभाषा का दर्जा मिलने के कारण इसी का ज्ञान रखने वालों को राज्य में प्रशासनिक पदों की प्राप्ति होती थी । अतः भारतीय भी फारसी भाषा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आकर्षित हुए। इस्लामिक शासन के अन्तगर्त अनेक वंश के शासकों ने शासन किया और लगभग सभी ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ न कुछ योगदान दिया। सभी शासकों ने शिक्षा के महत्त्व को समझते हुए शिक्षकों व विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। केन्द्रीय शासन के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रीय शासकों ने भी शिक्षा की प्रगति के सराहनीय कार्य किए, इनमें बीजापुर, बंगाल, जौनपुर आदि बहुत प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र थे। मुगलकाल से भारतीय शिक्षा की रुपरेखा ही परिवर्तित हो गई थी। बाबर द्वारा श्शुहरत-ए-आमश् नामक विभाग बनाकर प्रकाशन व नवीन विद्यालयों की स्थापना को बढ़ावा दिया गया। हुमायूँ ने पुस्तकालय बनवाया। अकबर के काल में हिन्दुओं की शिक्षा की तरफ भी ध्यान दिया गया। इस समय हिन्दू-मुसलमान विद्यार्थी साथ-साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। बाद में भी शासकों द्वारा अनेक सराहनीय कार्यों के द्वारा शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया। |
| Published In | Volume 3, Issue 10, October 2022 |
| Published On | 2022-10-08 |
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10.70528/IJLRP
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